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उत्तर प्रदेश के एटा जिले में खुदाई के दौरान मिली 9वीं-10वीं शताब्दी की ऐतिहासिक जैन तीर्थंकर की प्रतिमा अब पुलिस अभिरक्षा से निकलकर संग्रहालय की शोभा बढ़ाएगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदायों के बीच चल रहे मालिकाना हक के विवाद को देखते हुए इस बेशकीमती धरोहर को प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय (Central Museum) में सुरक्षित रखने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा विवाद?
जून 2025 में एटा के रिजोर क्षेत्र में ‘जल जीवन मिशन’ के तहत चल रही खुदाई के दौरान यह प्राचीन प्रतिमा प्राप्त हुई थी। मूर्ति के मिलते ही जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों—दिगंबर और श्वेतांबर—ने इस पर अपना-अपना दावा पेश किया। विवाद बढ़ता देख स्थानीय प्रशासन ने प्रतिमा को जब्त कर एटा के एक थाने में पुलिस कस्टडी में रखवा दिया था।
हाईकोर्ट का सख्त निर्देश
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी ऐतिहासिक संपत्ति को पुलिस थाने में नहीं रखा जा सकता। अदालत के मुख्य निर्देश निम्नलिखित हैं:
स्थानांतरण: प्रतिमा को 11 अप्रैल 2026 तक हर हाल में प्रयागराज केंद्रीय संग्रहालय के निदेशक को सौंपना होगा।
सुरक्षा की जिम्मेदारी: एटा के जिला मजिस्ट्रेट (DM) को यह सुनिश्चित करना होगा कि मूर्ति को पूरी सुरक्षा के साथ प्रयागराज पहुँचाया जाए।
सार्वजनिक दर्शन: संग्रहालय में पहुँचने के बाद इस प्रतिमा को आम जनता के दर्शन के लिए उचित स्थान पर स्थापित किया जाएगा।
ASI की रिपोर्ट और विशेषज्ञों की भूमिका
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस मामले में अब तक दो रिपोर्ट पेश की हैं:
पहली रिपोर्ट: इसमें संकेत दिया गया था कि मूर्ति श्वेतांबर संप्रदाय की हो सकती है।
दूसरी रिपोर्ट: अगस्त 2025 में आई इस रिपोर्ट ने पहले के दावे को अनिर्णायक बताया। ASI के अनुसार, मूर्ति की शैली और लक्षण दोनों संप्रदायों में समान रूप से पाए जाते हैं, इसलिए केवल बाहरी दिखावट के आधार पर फैसला नहीं लिया जा सकता।
विशेषज्ञ समिति करेगी फैसला
कोर्ट ने प्रतिमा की सही पहचान और काल निर्धारण के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश दिया है। इस समिति में श्वेतांबर और दिगंबर दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ ASI के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। यह टीम तीन महीने के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट बंद लिफाफे में अदालत को सौंपेगी।
अगली कार्रवाई
अदालत ने कहा कि ‘इंडियन ट्रेजर ट्रोव एक्ट, 1878’ के तहत कलेक्टर ही ऐसी संपत्तियों का संरक्षक होता है। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी, जिसमें जिला प्रशासन को मूर्ति सौंपने की प्रक्रिया की ‘अनुपालन रिपोर्ट’ (Compliance Report) पेश करनी होगी।
निष्कर्ष: यह फैसला न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को शांत करने वाला है, बल्कि एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को धूल फांकते थानों से निकालकर सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान दिलाने की दिशा में भी बड़ा कदम है।

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