देहरादून, 19 मई। उत्तराखंड की राजनीति के एक स्वर्णिम और सबसे अनुशासित अध्याय का आज अंत हो गया। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का मंगलवार को देहरादून के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। खंडूड़ी जी के निधन की खबर सामने आते ही पूरे उत्तराखंड सहित देश के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई है।
अपने कड़क अनुशासन, बेदाग छवि, और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए पहचाने जाने वाले भुवन चंद्र खंडूड़ी ने न केवल दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में सूबे की कमान संभाली, बल्कि केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए देश के बुनियादी ढांचे को भी एक नई दिशा दी। उनके जाने से उत्तराखंड ने एक ऐसा जननेता खो दिया है, जिसकी पहचान सत्ता के गलियारों से ज्यादा सिद्धांतों की चौखट पर मजबूत थी।
सेना की वर्दी से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर
1 अक्टूबर 1934 को देहरादून की खूबसूरत वादियों में जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी के व्यक्तित्व में जो अनुशासन और कड़कपन था, उसकी जड़ें भारतीय सेना में थीं। राजनीति के मैदान में कदम रखने से पहले उन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा में एक लंबा और शानदार वक्त गुजारा। वे भारतीय सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स में शामिल हुए और अपनी बेहतरीन कार्यकुशलता और रणनीतिक सूझबूझ के बल पर मेजर जनरल के पद तक पहुंचे।
1982 में सेना में उनकी उत्कृष्ट और समर्पित सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ (AVSM) से सम्मानित किया गया था। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका राष्ट्र सेवा का जज्बा कम नहीं हुआ और उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी समाज और देश के विकास के लिए सार्वजनिक जीवन (राजनीति) का मार्ग चुना।
अटल सरकार में ‘सड़क क्रांति’ के महानायक
सेना से रिटायर होने के बाद भुवन चंद्र खंडूड़ी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थामा। साल 1991 के लोकसभा चुनावों में वे पहली बार गढ़वाल संसदीय सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद वे लगातार कई बार संसद पहुंचे और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उत्तराखंड का सबसे मजबूत और विश्वसनीय चेहरा बनकर उभरे।
खंडूड़ी जी की प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें अपनी सरकार में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। यह वही दौर था जब भारत में आधुनिक सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों की नींव रखी जा रही थी। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (PMGSY) को देश के नक्शे पर उतारने और पहाड़ों के दूरस्थ गांवों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने का श्रेय काफी हद तक खंडूड़ी जी की कड़ी निगरानी और कड़क कार्यशैली को जाता है। उन्होंने भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार करते हुए तय समय सीमा के भीतर सड़कों का जाल बिछाया, जिसे आज भी देश में याद किया जाता है।
उत्तराखंड के ‘जीरो टॉलरेंस’ वाले कड़क मुख्यमंत्री
साल 2007 में जब उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई, तो हाईकमान ने राज्य की बागडोर मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी को सौंपी। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही उन्होंने साफ कर दिया था कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और ढिलाई को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनके इस कार्यकाल को राज्य के इतिहास में ‘जीरो टॉलरेंस’ (भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता) के स्वर्णिम काल के रूप में जाना जाता है।
सरकारी दफ्तरों में वक्त की पाबंदी, फाइलों का तेजी से निपटारा और अफसरों की जवाबदेही तय करना उनकी प्राथमिकता थी। हालांकि, उनकी इसी कड़क प्रशासनिक सख्ती और सिद्धांतों से समझौता न करने की आदत के कारण पार्टी के भीतर ही कई विधायक और नेता असहज महसूस करने लगे थे। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन के बाद, उन्होंने एक सच्चे और नैतिक राजनेता की तरह हार की जिम्मेदारी अपने सिर ली और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन उनकी लोकप्रियता का असर ऐसा था कि पार्टी को साल 2011 में आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जनता का भरोसा जीतने के लिए दोबारा उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाना पड़ा।
हार के बाद भी बना रहा जनता के दिलों में सम्मान
साल 2012 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा ने “खंडूड़ी हैं जरूरी” के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। हालांकि, राजनीतिक समीकरणों और भीतरघात के चलते वे खुद कोटद्वार विधानसभा सीट से बेहद करीबी अंतर से चुनाव हार गए और राज्य में भाजपा की सरकार भी नहीं बन सकी। लेकिन इस व्यक्तिगत हार के बाद भी जनता के बीच उनका कद और सम्मान रत्ती भर भी कम नहीं हुआ। उनके विरोधी भी हमेशा उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और बेदाग चरित्र की तारीफ करते नहीं थकते थे।
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दौरान वे एक बार फिर गढ़वाल सीट से भारी बहुमत से सांसद चुने गए। लेकिन धीरे-धीरे बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के कारण उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीति की अग्रिम पंक्ति से दूर कर लिया और मार्गदर्शक की भूमिका में आ गए।
एक युग का अंत: सिद्धांतों की राजनीति के अंतिम स्तंभ
भुवन चंद्र खंडूड़ी सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि राजनीति में शुचिता, सादगी और कड़े अनुशासन की एक जीवित पाठशाला थे। आज के दौर में जहां राजनीति अक्सर समझौतों और समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां खंडूड़ी जी ने हमेशा अपने सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा।
देहरादून में उनके निधन के साथ ही उत्तराखंड की सियासत का एक बेहद गरिमामयी और कड़क युग समाप्त हो गया है। राज्य निर्माण के बाद उत्तराखंड को एक सही प्रशासनिक दिशा देने और विकास की नीति तैयार करने में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा। देवभूमि का यह ‘अनुशासन पुरुष’ भले ही आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी ईमानदारी की कहानियां आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मिसाल बनी रहेंगी।







