रुद्रप्रयाग। देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि पूरी क्यूंजा घाटी को दहशत और शोक में डुबो दिया है। बीते 4 अप्रैल से लापता चल रहे पांच वर्षीय मासूम मयंक का शव नौ दिनों के लंबे सर्च ऑपरेशन के बाद रविवार को जंगल में बरामद हुआ। मासूम की मौत की खबर मिलते ही बाड़व गांव में चीख-पुकार मच गई और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
क्या है पूरा मामला?
रुद्रप्रयाग जनपद के अंतर्गत क्यूंजा घाटी के बाड़व गांव निवासी विजय लाल और मनीषा देवी का पांच वर्षीय पुत्र मयंक 4 अप्रैल को संदिग्ध परिस्थितियों में घर के पास से लापता हो गया था। परिजनों ने काफी खोजबीन की, लेकिन जब बच्चे का कहीं पता नहीं चला, तो पुलिस को सूचना दी गई। मासूम के गायब होने की खबर फैलते ही प्रशासन हरकत में आया और मयंक की तलाश के लिए एक बड़े स्तर पर संयुक्त सर्च अभियान शुरू किया गया।
9 दिनों तक चला सघन सर्च ऑपरेशन
मयंक की तलाश में पुलिस प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पुलिस, एसडीआरएफ (SDRF) और डीडीआरएफ (DDRF) की टीमों ने गांव के आसपास के दुर्गम जंगलों, गहरी खाइयों और संभावित ठिकानों पर लगातार नौ दिनों तक तलाशी अभियान चलाया। खोजी कुत्तों और स्थानीय ग्रामीणों की मदद भी ली गई, लेकिन घने जंगलों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सफलता हाथ नहीं लग रही थी। रविवार सुबह रेस्क्यू टीम को गांव से लगभग दो से पांच किलोमीटर दूर जंगल के भीतर मयंक का निर्जीव शरीर मिला।
जंगली जानवर का हमला या कुछ और? संशय बरकरार
शव मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि मयंक की मौत कैसे हुई? आमतौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चों के लापता होने के पीछे गुलदार या अन्य जंगली जानवरों का हाथ होता है, लेकिन इस मामले ने वन विभाग और पुलिस को भी उलझा दिया है।
वन विभाग के रेंजर हरी शंकर रावत ने प्रारंभिक जानकारी देते हुए बताया कि:
”शव मिलने वाले स्थान और मासूम के शरीर के निरीक्षण से प्रथम दृष्टया किसी जंगली जानवर के हमले के स्पष्ट निशान नहीं मिले हैं। यह मामला काफी संदिग्ध प्रतीत हो रहा है।”
बिना किसी चोट या संघर्ष के निशान के शव का मिलना इस घटना को एक अनसुलझी पहेली बना रहा है। क्या बच्चा रास्ता भटक कर जंगल की गहराई में चला गया और भूख-प्यास या ठंड से उसकी जान गई, या फिर इसके पीछे कोई और मानवीय कारण है? इन सभी पहलुओं पर पुलिस गहनता से जांच कर रही है।
गांव में पसरा सन्नाटा, परिजनों का बुरा हाल
जैसे ही मयंक का शव गांव लाया गया, पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। मयंक के पिता विजय लाल और माता मनीषा देवी सुध-बुध खो बैठे हैं। ग्रामीण इस बात से स्तब्ध हैं कि आखिर एक छोटा सा बच्चा इतनी दूर घने जंगल में कैसे पहुंच गया। गांव की महिलाओं और बुजुर्गों की आंखों में आंसू हैं और हर कोई शासन-प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है।
पुलिस की कार्रवाई और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतज़ार
पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मौत के वास्तविक कारणों का खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो पाएगा।
प्रशासन की अपील:
स्थानीय प्रशासन ने ग्रामीणों से सतर्क रहने की अपील की है और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी गई है। पुलिस हर संभावित कोण से जांच कर रही है, जिसमें मानवीय लापरवाही या किसी अन्य साजिश की संभावना को भी नकारा नहीं जा रहा है।
निष्कर्ष
रुद्रप्रयाग की इस घटना ने एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा और वन्यजीवों के साथ बढ़ते संघर्ष (या अन्य खतरों) पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मयंक अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी मौत के पीछे के छिपे सच को सामने लाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। पूरी क्यूंजा घाटी आज मयंक की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रही है और एक ही सवाल पूछ रही है— आखिर मयंक के साथ क्या हुआ?







