उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम की बदली करवट अब चिंता का कारण बनती जा रही है। मार्च माह में सामान्य से 5 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जिससे पहाड़ी इलाकों में नमी की कमी और प्राकृतिक जलस्रोतों में जलस्राव में गिरावट देखी जा रही है। गर्मी का असर इतना बढ़ गया है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौजूद बर्फ तेजी से पिघलने लगी है।
मद्महेश्वर में नहीं बची बर्फ, वीरान हुआ बुग्याली इलाका
उच्च हिमालय की तलहटी में स्थित द्वितीय केदार *मद्महेश्वर धाम* अब पूरी तरह बर्फविहीन हो गया है। मंदिर परिसर के चारों ओर फैला बुग्याली क्षेत्र, जहां आमतौर पर अप्रैल तक बर्फ की चादर रहती थी, अब वीरान नजर आ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले सप्ताह तक कुछ हिस्सों में हल्की बर्फ थी, जो अब पूरी तरह गायब हो चुकी है।
केदारनाथ-तुंगनाथ में भी बर्फ तेजी से पिघल रही
केदारनाथ और तुंगनाथ जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर भी बर्फ पिघलने की रफ्तार तेज हो गई है। केदारनाथ धाम में अब मात्र दो से ढाई फीट बर्फ शेष रह गई है, जो धूप के कारण तेजी से कम हो रही है। भैरवनाथ और दुग्धगंगा की पहाड़ियों पर अब केवल कुछ नम स्थानों पर ही बर्फ बची है।
बर्फबारी का अभाव, प्राकृतिक जलस्रोतों पर संकट
मार्च के पहले कुछ दिन मौसम सुहावना था और थोड़ी बारिश भी हुई, लेकिन इसके बाद बारिश न के बराबर रही। बीते 15 दिनों से केदारनाथ धाम में कोई बर्फबारी नहीं हुई है। इससे जमीन की सतह सूखने लगी है और जलस्रोतों का बहाव भी घट गया है।
सितंबर से मार्च तक सामान्य से कम बारिश
पिछले वर्ष सितंबर से लेकर इस साल मार्च तक रुद्रप्रयाग समेत अन्य पर्वतीय जिलों में औसत से काफी कम वर्षा हुई है।
– जनवरी 2025: केवल 2.5 मिमी बारिश
– फरवरी 2025: अपेक्षित 108 मिमी की तुलना में मात्र 23 मिमी (79% की गिरावट)
– 27 फरवरी से 3 मार्च:रुद्रप्रयाग में 41.2 मिमी बारिश (औसत से 38% अधिक)
इस अवधि में बारिश की मात्रा कभी अधिक, तो कभी अत्यधिक कम रही, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता दिखाई दे रहा है।
सूरज की तेज तपन, चैत्र में महसूस हो रही ज्येष्ठ जैसी गर्मी
मार्च के मध्य से ही सूर्य की तपिश में असामान्य वृद्धि देखने को मिल रही है। घाटी वाले क्षेत्रों में चैत्र मास में ही लोगों को ज्येष्ठ माह जैसी गर्मी महसूस हो रही है। इससे फसलें भी प्रभावित हो रही हैं और जलस्तर में गिरावट आ रही है।
कृषि और पर्यावरण पर पड़ रहा प्रतिकूल असर
मुख्य कृषि अधिकारी **लोकेंद्र सिंह बिष्ट** ने बताया कि बारिश के बदलते चक्र से खेती बुरी तरह प्रभावित हो रही है। बुवाई, फूल आने और पकने के समय बारिश का न होना फसलों की उत्पादकता को कम कर रहा है।
वहीं, पर्यावरण विशेषज्ञ **देव राघवेंद्र सिंह चौधरी** का कहना है कि शीतकाल में आवश्यक बारिश और बर्फबारी का न होना अब पृथ्वी की सतह को पर्याप्त नमी नहीं दे पा रहा है। फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में जो थोड़ी बहुत बर्फबारी होती है, वह ज्यादा लाभ नहीं देती और थोड़ी सी धूप पड़ते ही पिघल जाती है।
नदी-नालों में जलस्तर गिरा, ग्लेशियर भी प्रभावित
ग्लेशियर क्षेत्रों में भी बर्फबारी की कमी से हिमखंडों की स्थिति कमजोर होती जा रही है। नदियों, गाड-गदेरों में पानी का बहाव कम हो गया है, जिससे पेयजल संकट और सिंचाई की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में मौसम चक्र के लगातार बिगड़ते स्वरूप ने प्रकृति, पर्यावरण और मानव जीवन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले महीनों में जल संकट, कृषि उत्पादकता में गिरावट और तापमान में असामान्य वृद्धि जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। सरकार और पर्यावरणविदों को मिलकर तत्काल समाधान की दिशा में प्रयास करना होगा।