नई दिल्ली / अमरावती:
भारत में सोने (Gold) के प्रति लोगों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है। शादियों का सीजन हो या त्योहार, देश में सोने की मांग हमेशा आसमान छूती है। लेकिन इस भारी मांग को पूरा करने के लिए भारत को हर साल अरबों डॉलर खर्च करके विदेशों से सोना आयात करना पड़ता है। अब इस मोर्चे पर भारत को एक ऐसी बड़ी कामयाबी मिली है, जो देश को सोने के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकती है।
आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में सोने का एक विशाल भंडार मिला है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, यहाँ करीब 50 टन सोने का रिजर्व मौजूद है। इस ऐतिहासिक खोज के बाद आंध्र प्रदेश आने वाले कुछ ही सालों में देश का सबसे बड़ा स्वर्ण उत्पादक और सप्लायर राज्य बनकर उभर सकता है।
9,000 करोड़ रुपये का खजाना: जोन्नागिरी में मिला मुख्य भंडार
आंध्र प्रदेश के माइंस विभाग के प्रधान सचिव मुकेश कुमार मीणा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बड़ी सफलता की आधिकारिक पुष्टि की है। विभाग के मुताबिक, कुरनूल जिले का जोन्नागिरी गांव इस खोज का मुख्य केंद्र है।
भारतीय सर्राफा बाजार के मौजूदा भावों के आधार पर, जोन्नागिरी में मिले इस 50 टन सोने की अनुमानित कीमत 7,500 करोड़ रुपये से लेकर 9,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में होने वाले दैनिक उतार-चढ़ाव के कारण इस खजाने की अंतिम वैल्यूएशन में थोड़ा बदलाव आ सकता है। लेकिन यह निश्चित है कि इतनी बड़ी मात्रा में सोने की उपलब्धता देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी।
जोन्नागिरी माइनिंग प्रोजेक्ट का पूरा गणित
जोन्नागिरी में सोने की खोज की कहानी करीब एक दशक पुरानी है। अधिकारियों ने बताया कि:
• लगभग 10 साल पहले यहाँ सोने के खनन के लिए 1,500 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी।
• शुरुआती चरण में केवल 500 एकड़ क्षेत्र में ही सर्वे और खोज का काम पूरा हो सका था, जहां लगभग 13 टन सोना मिलने की संभावना जताई गई थी।
• अब बची हुई 1,000 एकड़ जमीन पर भी नए सिरे से काम शुरू किया जा रहा है, जिससे कुल रिजर्व बढ़कर 50 टन के पार जाने की उम्मीद है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए राज्य सरकार पूरी मुस्तैदी से जुट गई है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इसी महीने के अंत में आधिकारिक रूप से जोन्नागिरी गोल्ड माइनिंग (Gold Mining) के काम का शुभारंभ करेंगे।
सिर्फ जोन्नागिरी नहीं, 4 और ठिकानों की हुई पहचान
आंध्र प्रदेश सरकार केवल जोन्नागिरी तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। माइंस विभाग ने राज्य में सोने के खनन के लिए चार और संभावित स्थलों को चिन्हित किया है, जहां भविष्य में बड़ा खजाना मिल सकता है। इन साइट्स में शामिल हैं:
1. रामागिरी
2. जव्वकुला
3. चिगुरुकुंटा
4. बिस्नाटम
राज्य सरकार इन सभी खनिज-समृद्ध इलाकों में आगे की खोज और उनके व्यापक विकास के लिए एक मेगा एक्शन प्लान तैयार कर रही है।
बेहद जटिल है खनन की प्रक्रिया: 1 टन मलबे से सिर्फ 1 ग्राम सोना
जमीन के भीतर से सोना निकालना जितना आकर्षक लगता है, व्यावहारिक रूप से यह उतना ही चुनौतीपूर्ण, खर्चीला और तकनीकी काम है। मुकेश कुमार मीणा ने बताया कि गोल्ड माइनिंग के लिए भारी-भरकम पूंजी निवेश और उन्नत तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है। इसी वजह से सरकार ने पूरी पारदर्शिता बरतते हुए टेंडर प्रक्रिया के जरिए निजी कंपनियों को इस काम की कमान सौंपने का फैसला किया है।
उन्होंने माइनिंग से जुड़ा एक बेहद चौंकाने वाला तकनीकी पहलू भी साझा किया। उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में माइनिंग मटेरियल से सोना निकलने की दर (Yield) में भारी कमी आई है:
• पहले की स्थिति: पहले एक टन मलबे की प्रोसेसिंग करने पर करीब 3 ग्राम शुद्ध सोना प्राप्त होता था।
• मौजूदा स्थिति: आज के समय में तकनीक बदलने और अयस्क की गुणवत्ता के कारण 1 टन मलबे से महज 1 ग्राम सोना ही निकल पाता है।
• जोखिम: अधिकारियों के मुताबिक, यदि यह दर 0.8 ग्राम प्रति टन से कम हो जाती है, तो सोने का खनन करना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन जाता है।
भारत की सोने की ‘भूख’ और केजीएफ (KGF) का इतिहास
भारत दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है, जहां हर साल लगभग 800 टन सोने की भारी-भरकम खपत होती है। इसके मुकाबले हमारा घरेलू उत्पादन न के बराबर है।
साल 2000 में कर्नाटक की मशहूर कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) के बंद होने के बाद से भारत का घरेलू स्वर्ण उत्पादन लगातार गिरता चला गया। वर्तमान में कर्नाटक की सरकारी ‘हुट्टी गोल्ड माइन्स’ ही देश की एकमात्र सक्रिय सोने की खदान है, जिससे सालाना महज 1.5 टन सोने का उत्पादन हो पाता है।
ऐसे में अपनी भारी मांग को पूरा करने के लिए भारत पूरी तरह से विदेशी आयात (Gold Import) पर निर्भर है, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बड़े पैमाने पर खर्च होता है। आंध्र प्रदेश की यह नई खोज इस मोर्चे पर देश को आत्मनिर्भर बनाने और विदेशी निर्भरता को कम करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

