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जनभावनाओं के आगे झुकी सरकार: देहरादून-ऋषिकेश फोरलेन के लिए पेड़ों के कटान पर सीएम ने लगाई रोक, बोले– ‘सहमति के बिना नहीं बढ़ेगा काम

​देहरादून।

उत्तराखंड के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच जारी बहस के बीच मुख्यमंत्री ने एक बेहद संवेदनशील और बड़ा फैसला लिया है। देहरादून-ऋषिकेश हाईवे को फोर/सिक्स लेन बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत होने वाले पेड़ों के कटान पर मुख्यमंत्री ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

सीएम ने स्पष्ट शब्दों में निर्देश जारी किए हैं कि जब तक इस परियोजना को लेकर जनता, पर्यावरण प्रेमियों, स्थानीय नागरिकों और सभी संबंधित पक्षों के बीच एक आम सहमति नहीं बन जाती, तब तक एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। सरकार का यह कदम लोकतंत्र में जनभावनाओं और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की एक बड़ी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

​क्या है पूरा मामला और क्यों बढ़ा विवाद?

​दरअसल, देहरादून से ऋषिकेश के बीच यातायात को सुगम और तीव्र बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा एक भव्य फोर/सिक्स लेन हाईवे का निर्माण किया जा रहा है। बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिहाज से यह राज्य की एक बेहद महत्वपूर्ण और ड्रीम परियोजना है।

इस परियोजना के लिए सभी आवश्यक वैधानिक और पर्यावरणीय स्वीकृतियां भी प्राप्त कर ली गई थीं और माननीय उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के तहत ही काम को आगे बढ़ाया जा रहा था।

​लेकिन, जैसे ही हाईवे चौड़ीकरण के दायरे में आने वाले हरे-भरे पेड़ों को काटने की सुगबुगाहट शुरू हुई, स्थानीय जनता और पर्यावरण प्रेमियों का विरोध मुखर हो गया। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया से लेकर धरातल तक अनेक नागरिकों और सामाजिक संगठनों द्वारा इस कटान को लेकर चिंताएं और कड़े सुझाव व्यक्त किए जा रहे थे।

देवभूमि की हरियाली को बचाने के लिए उठती इन आवाजों का मुख्यमंत्री ने स्वतः संज्ञान लिया और इस पर एक बड़ा निर्णय सुनाया।

​विकास भी जरूरी, लेकिन जनभावनाओं की अनदेखी नहीं: मुख्यमंत्री

​मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य का आर्थिक और भौतिक विकास हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है, लेकिन जनभावनाओं, पर्यावरण और स्थानीय हितों की अनदेखी कर कोई भी निर्णय नहीं थोपा जाएगा।

​सीएम ने कहा:

​”देहरादून-ऋषिकेश परियोजना को लेकर पिछले कुछ दिनों से जनता और पर्यावरणविदों द्वारा व्यक्त की जा रही चिंताओं से मैं भली-भांति अवगत हूँ। हम विकास चाहते हैं, लेकिन वह विकास विनाश की कीमत पर या जनता को दुखी करके नहीं होना चाहिए।

इसलिए मैंने प्रमुख सचिव और संबंधित विभाग के आला अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे सभी हितधारकों, स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और विशेषज्ञों के साथ बैठकर एक बार फिर से विस्तृत संवाद स्थापित करें।”

​सीएम ने यह भी साफ किया कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों और निर्णयों का पूर्ण सम्मान करते हुए ही आगे की कोई भी कार्यवाही की जाएगी। लेकिन जब तक सभी पक्षों के साथ एक संतोषजनक सहमति और आपसी विश्वास का वातावरण नहीं बन जाता, तब तक इस परियोजना के अंतर्गत आने वाले पेड़ों का कटान पूरी तरह से स्थगित रहेगा।

​परियोजना में वन्यजीव संरक्षण का भी है विशेष प्रावधान

​यह बात भी सामने आई है कि NHAI की इस परियोजना को तैयार करते समय पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया था। इस मार्ग पर अक्सर होने वाली मानव-वन्यजीव भिड़ंत और सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मौत को रोकने के लिए कई आधुनिक तकनीक शामिल की गई हैं।

• ​हाथी अंडरपास: वन्यजीवों (विशेषकर हाथियों) के सुरक्षित आवागमन के लिए इस हाईवे पर लगभग 3.5 किलोमीटर लंबा एक विशेष हाथी अंडरपास बनाने का प्रावधान है।
• ​विशेष कल्वर्ट (Culverts): छोटे वन्यजीवों और सरीसृपों के बिना किसी खतरे के सड़क पार करने के लिए विशेष कल्वर्ट्स का डिजाइन तैयार किया गया है।

​सरकार का मानना है कि इन प्रावधानों से दुर्घटनाओं में भारी कमी आएगी, जो कि इस व्यस्त मार्ग की एक पुरानी और गंभीर समस्या रही है।

​संवाद से निकलेगा बीच का रास्ता

​मुख्यमंत्री के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब गेंद प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय जनता के पाले में है। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश हैं कि वे बंद कमरों में निर्णय लेने के बजाय जमीन पर जाकर लोगों से बात करें।

पर्यावरणविदों के सुझावों को तकनीकी रूप से परखा जाएगा ताकि विकास की रफ्तार भी न थमे और उत्तराखंड के जंगलों व पर्यावरण को भी कम से कम नुकसान हो।

​तय माना जा रहा है कि सरकार का यह ‘संवाद मॉडल’ आने वाले समय में अन्य विकास परियोजनाओं के लिए भी एक नजीर बनेगा, जहाँ जनता की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों ने मुख्यमंत्री के इस संवेदनशील फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि संवाद के जरिए कोई ऐसा बीच का रास्ता जरूर निकलेगा जो प्रकृति और प्रगति दोनों को साथ लेकर चले।

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