काठमांडू: हिमालय की गोद में बसे नेपाल में आज भविष्य की नई इबारत लिखी जा रही है। गुरुवार सुबह 7 बजे से शुरू हुए मतदान ने न केवल लंबी कतारें दिखाईं, बल्कि सत्ता के गलियारों में उस ‘बदलाव’ की आहट भी पैदा कर दी है, जिसकी मांग पिछले साल युवाओं ने सड़कों पर उतर कर की थी। यह चुनाव केवल एक नई सरकार चुनने का जरिया नहीं है, बल्कि नेपाल की पारंपरिक सियासत और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के बीच एक आर-पार की जंग है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘यंगिस्तान’ का हुंकार
पिछले साल नेपाल ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ युवाओं का वो रौद्र रूप देखा था, जिसने पूरी व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। उस आंदोलन की आग में 77 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और सोशल मीडिया तक पर पाबंदी लगानी पड़ी। आज उसी आक्रोश का असर बूथों पर दिख रहा है। 1.9 करोड़ कुल मतदाताओं में से 8 लाख ऐसे नए युवा वोटर हैं, जो पहली बार लोकतंत्र के इस महापर्व में हिस्सा ले रहे हैं।
अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की देखरेख में हो रहे इन चुनावों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं। दुर्गम पहाड़ी इलाकों तक हेलीकॉप्टरों से चुनावी सामग्री पहुंचाई गई है, ताकि हर एक नेपाली अपनी आवाज बुलंद कर सके।
नायक बनाम महाबली: ओली और शाह की सीधी टक्कर
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प और हाई-प्रोफाइल मुकाबला झापा-5 सीट पर देखने को मिल रहा है। एक तरफ हैं 74 वर्षीय अनुभवी मार्क्सवादी नेता और पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली, जो अपनी खोई हुई सत्ता वापस पाने की जद्दोजहद में हैं। वहीं दूसरी तरफ हैं 35 वर्षीय बालेंद्र (बालेन) शाह—पूर्व मेयर, रैपर और ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) के चेहरे, जिन्हें युवा अपना ‘नायक’ मान रहे हैं।
शाह का चुनाव चिह्न ‘घंटी’ है, और उनका दावा है कि यह घंटी नेपाल के पुराने और सुस्त पड़ चुके राजनीतिक तंत्र को जगाने के लिए काफी है। झापा में कतार में खड़े बुजुर्ग मतदाता भी अब युवाओं के बलिदान को याद कर बदलाव की उम्मीद जता रहे हैं।
पुराने चेहरे और नई चुनौतियां
सिर्फ बालेन शाह ही नहीं, बल्कि नेपाली कांग्रेस के 49 वर्षीय नेता गगन थापा भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में एक मजबूत दावेदार बनकर उभरे हैं। थापा का साफ कहना है कि देश को अब ‘बुजुर्गों के क्लब’ से बाहर निकलकर सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की ओर बढ़ना होगा। वहीं, पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ और बाबूराम भट्टाराई जैसे दिग्गज नेताओं की साख भी इस बार दांव पर लगी है।
चुनावी गणित और भविष्य का सवाल
नेपाल की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए समीकरण कुछ इस प्रकार हैं:
165 सीटें: प्रत्यक्ष चुनाव के जरिए (3400 से अधिक उम्मीदवार मैदान में)।
110 सीटें: आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से।
मुख्य चुनाव आयुक्त राम प्रसाद भंडारी के अनुसार, शुरुआती नतीजे अगले 24 घंटों में आने शुरू हो जाएंगे। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में बहुमत मिलना हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है। अगर इस बार भी किसी एक पार्टी को स्पष्ट जनादेश नहीं मिला, तो गठबंधन की खींचतान में सरकार बनने में लंबा वक्त लग सकता है।
निष्कर्ष:
नेपाल की जनता के सामने दो रास्ते हैं—एक तरफ अनुभव का भारी भरकम इतिहास है और दूसरी तरफ ‘जेन-जी’ का जोश और बदलाव की ललक। क्या नेपाल का यह नया मतदाता इतिहास बदलेगा या पुराने खिलाड़ी एक बार फिर बाजी मार ले जाएंगे? इसका फैसला मतपेटियों में कैद हो चुका है।
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नेपाल चुनाव 2026: क्या ‘जेन-जी’ की ‘घंटी’ हिला पाएगी दिग्गजों का सिंहासन?
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