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राज्यसभा की खाली सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव ने देश का सियासी पारा चढ़ा दिया है। विशेष रूप से बिहार, हरियाणा और ओडिशा में समीकरण कुछ ऐसे उलझे हैं कि अब हार-जीत का फैसला केवल संख्याओं से नहीं, बल्कि ‘क्रॉस वोटिंग’ और ‘सेंधमारी’ से होने की उम्मीद है। बीजेपी ने इन राज्यों में अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर विपक्षी खेमे की धड़कनें तेज कर दी हैं।
बिहार: 3 वोटों का फासला और एनडीए की रणनीति
बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। एनडीए ने पाँचों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, जबकि संख्या बल के हिसाब से उसके पास केवल चार सीटें सुरक्षित रूप से जीतने का बहुमत है।
जीत का गणित: बिहार में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 41 वोटों की आवश्यकता है।
एनडीए की स्थिति: एनडीए के पास वर्तमान में 202 विधायक हैं। चार उम्मीदवारों को जिताने के बाद एनडीए के पास 38 सरप्लस वोट बचेंगे।
चुनौती: पाँचवीं सीट पर आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा मैदान में हैं। उन्हें जीतने के लिए मात्र 3 अतिरिक्त वोटों की दरकार है।
विपक्ष का संकट: आरजेडी नेतृत्व वाले गठबंधन को अपने उम्मीदवार जिताने के लिए 6 वोटों की कमी पड़ रही है। ऐसे में बीजेपी की नजर विपक्ष के असंतुष्ट विधायकों पर है।
हरियाणा: निर्दलीय के सहारे बीजेपी की बिसात
हरियाणा में दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवारों के मैदान में आने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। यहाँ भाजपा और कांग्रेस के पास एक-एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त (31 प्रथम वरीयता वोट) संख्या है।
पेच कहाँ फँसा? बीजेपी ने पूर्व सांसद संजय भाटिया को उतारा है, जबकि कांग्रेस ने लो-प्रोफाइल नेता कर्मवीर सिंह बौद्ध पर दांव खेला है। असली ट्विस्ट सतीश नांदल के निर्दलीय नामांकन से आया है, जिन्हें बीजेपी का समर्थन प्राप्त है।
वोटों का अंतर: बीजेपी के पास अपने 48 विधायकों और निर्दलीयों के समर्थन के बाद भी नांदल को जिताने के लिए 9 वोटों की कमी पड़ रही है।
कांग्रेस की चिंता: कांग्रेस के भीतर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी से उपजी नाराजगी का फायदा बीजेपी उठा सकती है। यदि कांग्रेस के कुनबे में सेंध लगी, तो सतीश नांदल दूसरी सीट निकालकर सबको चौंका सकते हैं।
ओडिशा: चौथी सीट पर ‘दिलीप रे’ का दांव
ओडिशा की चार सीटों पर होने वाले चुनाव में भाजपा दो सीटें आसानी से जीत रही है, लेकिन असली घमासान चौथी सीट के लिए है।
संख्या बल: एक सीट के लिए 30 वोटों की जरूरत है। भाजपा के पास 79 विधायक हैं, जिससे दो सीटें जीतने के बाद 19 सरप्लस वोट बचते हैं।
विपक्ष की एकजुटता: भाजपा को चौथी सीट से रोकने के लिए बीजद, कांग्रेस और माकपा ने हाथ मिलाया है।
रणनीति: भाजपा समर्थित उम्मीदवार दिलीप रे की जीत पूरी तरह से क्रॉस वोटिंग पर निर्भर है। बीजद और कांग्रेस के गठबंधन के बावजूद क्या बीजेपी विपक्षी खेमे में दरार पैदा कर पाएगी? यह 16 मार्च को साफ होगा।
निष्कर्ष
इन तीनों राज्यों में बीजेपी की रणनीति स्पष्ट है—सरप्लस वोटों का अधिकतम इस्तेमाल और विपक्षी खेमे में सेंधमारी। अगर 16 मार्च तक नामांकन वापस नहीं लिए जाते हैं, तो बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग की संभावना है, जो राज्यसभा के आगामी गणित को पूरी तरह बदल सकती है।

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