असम विधानसभा चुनावों की दहलीज पर खड़ी कांग्रेस पार्टी के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा का पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होना, कांग्रेस के लिए न केवल एक सांगठनिक क्षति है, बल्कि यह पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह और नेतृत्व की रणनीतिक चूक को भी उजागर करता है।
एक लंबा सफर और अचानक विदाई
भूपेन बोरा का कांग्रेस के साथ रिश्ता तीन दशकों पुराना था। एनएसयूआई (NSUI) से अपनी राजनीति शुरू करने वाले बोरा ने युवक कांग्रेस और फिर मुख्यधारा की राजनीति में अपनी पहचान बनाई। तरुण गोगोई की सरकार में संसदीय सचिव रहे बोरा को संगठन का माहिर खिलाड़ी माना जाता था। हालांकि, 2016 और 2021 के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, फिर भी हाईकमान ने उन पर भरोसा जताते हुए प्रदेश की कमान सौंपी थी।
सामाजिक समीकरणों पर चोट
कांग्रेस के लिए बोरा का जाना केवल एक ‘नेता’ का जाना नहीं है, बल्कि एक बड़े वोट बैंक का खिसकना भी हो सकता है।
कूच राजवंशी प्रभाव: बोरा इसी समुदाय से आते हैं, जिसका ब्रह्मपुत्र घाटी के कई जिलों जैसे लखीमपुर, धेमाजी और बरपेटा में खासा प्रभाव है।
रणनीतिक क्षति: बीजेपी ने बोरा को शामिल कर कांग्रेस के सामाजिक समीकरणों में सेंध लगा दी है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का खुद उनके घर जाना इस बात का संकेत है कि बीजेपी उन्हें कितना महत्व दे रही है।
क्या फिर नाकाम रहा कांग्रेस नेतृत्व?
असम कांग्रेस के गलियारों में चर्चा है कि प्रभारी जिंदेंद्र सिंह और केंद्रीय नेतृत्व स्थिति को संभालने में विफल रहे। इस्तीफे के बाद बोरा के बयानों ने पार्टी की आंतरिक गुटबाजी को चौराहे पर ला खड़ा किया है:
वर्चस्व की जंग: बोरा का आरोप है कि प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई केवल एक चेहरा हैं, जबकि पार्टी की कमान रकीबुल हुसैन के हाथों में है।
अनदेखी: गठबंधन की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी मिलने के बावजूद, बोरा अपने कामकाज में बड़े नेताओं के हस्तक्षेप से नाराज थे।
देर से डैमेज कंट्रोल: जब बोरा ने इस्तीफा दे दिया, तब प्रभारी उनके घर मान-मनौव्वल करने पहुंचे, जिसे ‘चिड़िया चुग गई खेत’ वाली स्थिति माना जा रहा है।
प्रियंका गांधी का ‘मिशन असम’ और डैमेज कंट्रोल
भूपेन बोरा के जाने के तुरंत बाद प्रियंका गांधी ने गुवाहाटी मोर्चा संभाला। उन्होंने ब्लॉक अध्यक्षों के साथ बैठक कर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश की। कांग्रेस के लिए राहत की बात सिर्फ इतनी रही कि बोरा के साथ कोई बड़ा जत्था बीजेपी में शामिल नहीं हुआ।
कांग्रेस अब रिपुन बोरा के जरिए अपने सामाजिक आधार को बचाने की कोशिश कर रही है। साथ ही, पार्टी अब बोरा को ‘भितरघाती’ बताकर जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उनके जाने से पार्टी और अधिक एकजुट होगी।
आगे की राह: क्या होगा चमत्कार?
प्रियंका गांधी अब खुद उम्मीदवारों की सूची और गठबंधन की रणनीति को अंतिम रूप दे रही हैं। बीजेपी सरकार के खिलाफ ‘चार्जशीट’ जारी कर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाने के संकेत दिए हैं।
निष्कर्ष: चुनाव से ठीक पहले एक अनुभवी चेहरे का जाना कांग्रेस के आत्मविश्वास को कमजोर जरूर करता है। अब देखना यह है कि क्या प्रियंका गांधी की नई रणनीति और लुभावनी घोषणाएं असम में कांग्रेस की नैया पार लगा पाएंगी, या नेतृत्व की ये कमियां पार्टी को एक और हार की ओर ले जाएंगी।
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