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​उत्तराखंड: डोईवाला में पहाड़ों पर भारी बारिश का कहर, अस्थाई पुलिया बहने से 6 गांवों का संपर्क टूटा, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

​मुख्य बिंदु:

• ​पर्वतीय क्षेत्रों में मूसलाधार बारिश के बाद उफान पर आए नदी-नाले।
• ​डोईवाला की गडूल ग्राम सभा के शीला चौकी मार्ग पर बनी अस्थाई पुलिया और रास्ता बहा।
• ​एक साल पहले आपदा में टूटे पुल का अब तक नहीं हुआ पुनर्निर्माण।
• ​स्कूली बच्चों, मरीजों और बुजुर्गों की बढ़ी मुश्किलें; ग्रामीणों ने किया जोरदार प्रदर्शन।
​डोईवाला (उत्तराखंड)।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार हो रही तेज बारिश के कारण मैदानी और तराई इलाकों में नदियां और बरसाती नाले उफान पर हैं। भारी बारिश के चलते देहरादून जनपद के डोईवाला विधानसभा क्षेत्र में स्थिति गंभीर हो गई है।

यहाँ की गडूल ग्राम सभा के शीला चौकी क्षेत्र में बरसाती खाले (नाले) में आए तेज बहाव के कारण लोक निर्माण विभाग द्वारा बनाई गई अस्थाई पुलिया और संपर्क मार्ग पूरी तरह से बह गया है।

इस घटना के बाद क्षेत्र के लगभग आधा दर्जन (6) गांवों का मुख्य मार्ग और बाजार से संपर्क पूरी तरह से कट गया है, जिससे हजारों की आबादी टापू में तब्दील हो गई है।

​एक साल बाद भी नहीं बदला मंजर, प्रशासन की लापरवाही आई सामने

​स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है। पिछले वर्ष मानसून के दौरान आई भीषण आपदा में यहाँ का मुख्य संपर्क पुल और पक्की सड़क पूरी तरह जमींदोज हो गए थे।

आपदा के बीत जाने के बाद ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन और संबंधित विभागों से लगातार नए पुल के निर्माण की गुहार लगाई थी। लेकिन एक साल का लंबा समय बीत जाने के बावजूद विभाग द्वारा स्थायी पुल का निर्माण शुरू नहीं कराया जा सका।

​प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर एक अस्थाई पुलिया और रास्ता तैयार किया था, जो इस साल की पहली ही तेज बारिश के बहाव को झेल नहीं सका और ताश के पत्तों की तरह बह गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि अगर समय रहते पक्के पुल का निर्माण कर लिया जाता, तो आज सैकड़ों परिवारों को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता।

​जनजीवन बुरी तरह प्रभावित: पढ़ाई छूटी, इलाज के लाले पड़े

​मार्ग और पुलिया के बह जाने से क्षेत्र के गडूल और आसपास के करीब छह गांवों का जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया है। बरसात शुरू होते ही इन गांवों के लोगों के सामने राशन, चिकित्सा और शिक्षा का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

• ​स्कूली बच्चों का भविष्य अधर में: पुल न होने के कारण सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को उठानी पड़ रही है। उफनते खाले को पार करना बच्चों के लिए जान जोखिम में डालने जैसा है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि कई परिवारों को अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए डोईवाला शहर में महंगे किराये के कमरे लेकर रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। जो ग्रामीण किराये का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, उनके बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो गई है।
• ​मरीजों और बुजुर्गों के लिए काल बना बरसाती नाला: क्षेत्र में किसी के बीमार होने पर उसे अस्पताल पहुंचाना एक भागीरथी प्रयास जैसा हो गया है। सड़क मार्ग बंद होने से एंबुलेंस गांवों तक नहीं पहुंच पा रही है। ग्रामीणों को डर है कि यदि रात के समय कोई आपातकालीन चिकित्सा स्थिति पैदा होती है, तो मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना असंभव हो जाएगा। बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है।
• ​किसानों की आर्थिक कमर टूटी: यह ग्रामीण इलाका मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। संपर्क मार्ग टूटने से किसानों की सब्जियां, दूध और अन्य उत्पाद मंडियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

​आक्रोशित ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, सरकार के खिलाफ नारेबाजी

​प्रशासनिक उदासीनता और मूलभूत सुविधाओं के अभाव से नाराज ग्रामीणों का गुस्सा शनिवार को फूट पड़ा। क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) रविन्द्र रावत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीण घटना स्थल पर एकत्रित हुए और सरकार व संबंधित विभाग के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने प्रशासनिक ढर्रे पर गहरी नाराजगी जताते हुए जल्द से जल्द पक्के पुल के निर्माण की मांग की।

​प्रदर्शन की सूचना मिलते ही डोईवाला ब्लॉक प्रमुख गौरव सिंह भी मौके पर पहुंचे। उन्होंने प्रभावित ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीरता से सुना और स्थिति का जायजा लिया। ब्लॉक प्रमुख ने ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि वह इस गंभीर समस्या को शासन स्तर पर उठाएंगे और आपदा प्रबंधन व लोनिवि (PWD) के अधिकारियों से वार्ता कर जल्द से जल्द यातायात सुचारू कराने का प्रयास करेंगे।

​आवाजाही पूरी तरह बाधित, मंडरा रहा है बड़ा खतरा

​वर्तमान में खाले (नाले) में जलस्तर बेहद ऊंचा है और पानी का बहाव तेज है। इसके बावजूद कुछ लोग जान जोखिम में डालकर नाला पार करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे किसी बड़ी अनहोनी की आशंका बनी हुई है।

स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि जब तक पक्का पुल नहीं बनता, तब तक के लिए कोई सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग तैयार किया जाए और आपातकालीन स्थिति के लिए मौके पर एसडीआरएफ (SDRF) या सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की जाए।

​अब देखना यह होगा कि पिछले एक साल से नींद में सोया प्रशासनिक अमला इस जन समस्या को कितनी गंभीरता से लेता है और इन 6 गांवों के ग्रामीणों को इस ‘बरसाती कैद’ से कब तक मुक्ति मिलती है।

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