मिडिल ईस्ट की आग अब केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है। आज कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के पार जा चुका है और दुनिया एक ऐसे ऊर्जा संकट (Oil Crisis) का सामना कर रही है, जिसकी कल्पना कुछ महीनों पहले तक नहीं की गई थी। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है—अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वह रणनीति, जिसे अब उनकी सबसे बड़ी कूटनीतिक चूक माना जा रहा है।
जब ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ दांव पर लगा
ईरान के खिलाफ शुरू किए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दौरान अमेरिका और इजरायल ने सैन्य शक्ति का भरपूर प्रदर्शन किया। लेकिन इस सैन्य योजना के पीछे एक गंभीर खामी छिपी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, पेंटागन और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने ईरान की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को बहुत कम आंका था।
ट्रंप प्रशासन को भरोसा था कि अमेरिकी सैन्य दबाव ईरान को झुकने पर मजबूर कर देगा, लेकिन हुआ इसके उलट। ईरान ने दुनिया की तेल सप्लाई की जीवनरेखा कहे जाने वाले ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ (Hormuz Strait) को ब्लॉक कर दिया। जहाँ से दुनिया का 20% तेल और गैस गुजरता है, वहां अब सन्नाटा है।
एजेंसियों की अनदेखी: फैसले लेने का ‘छोटा घेरा’
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट की जड़ ट्रंप की कार्यशैली में है। पहले की सरकारों में जब भी कोई बड़ा सैन्य कदम उठाया जाता था, तो वित्त विभाग (Treasury) और ऊर्जा विभाग (Energy Department) की भविष्यवाणियों को सबसे ऊपर रखा जाता था। लेकिन ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के वक्त ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट की आर्थिक चेतावनियों को केवल ‘द्वितीयक’ या गौण माना गया।
ट्रंप ने अपने कुछ करीबी सलाहकारों के एक छोटे समूह पर इतना भरोसा किया कि विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच होने वाली उस बहस को किनारे कर दिया गया, जो आर्थिक परिणामों की चेतावनी दे रही थी। नतीजा यह हुआ कि ईरान की ‘हॉर्मुज बंदी’ का कोई ठोस काट अमेरिका के पास तैयार नहीं था।
कभी भारत पर ‘टैरिफ’, आज रूस से ‘मिन्नतें’
राजनीति और वक्त का पहिया कितनी तेजी से घूमता है, इसका उदाहरण आज का अमेरिका है। कुछ समय पहले तक ट्रंप प्रशासन भारत जैसे देशों पर दबाव बनाता था और रूसी तेल खरीदने पर टैरिफ की धमकी देता था। लेकिन आज हॉर्मुज बंद होने और $125 प्रति बैरल तक पहुंच चुके तेल के दामों ने ट्रंप को ‘असहाय’ कर दिया है।
अब स्थिति यह है कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अमेरिका खुद रूस से तेल की सप्लाई बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है। इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना कहा जा रहा है कि जो नेता ‘अमेरिका फर्स्ट’ और प्रतिबंधों की राजनीति करता था, आज वही वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अपने विरोधियों की ओर देखने को मजबूर है।
निष्कर्ष: ‘Worst-Case Scenario’ की हकीकत
पेंटागन के कुछ अधिकारियों ने अब स्वीकार करना शुरू कर दिया है कि वे वर्तमान स्थिति को “वर्स्ट-केस सिनेरियो” (सबसे खराब स्थिति) के रूप में देख रहे हैं। ईरान की ओर से अपने सुप्रीम लीडर को खोने के बाद चला गया यह दांव न केवल सैन्य रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी अमेरिका पर भारी पड़ रहा है।
अगर हॉर्मुज की नाकाबंदी जल्द नहीं खुली, तो तेल की कीमतें आसमान छूती रहेंगी और इसका खामियाजा केवल अमेरिका को नहीं, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया को भुगतना होगा। ट्रंप की यह ‘रणनीतिक भूल’ इतिहास में एक सबक की तरह याद रखी जाएगी।
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हॉर्मुज की नाकाबंदी और ट्रंप की वो ‘एक भूल’: क्या अमेरिका के अति-आत्मविश्वास ने दुनिया को तेल संकट में झोंका?
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