भारतीय रेल के इतिहास में दो ऐसे पुल हैं जिन्होंने न केवल शहरों को जोड़ा, बल्कि डेढ़ सदी से भी अधिक समय तक विकास के हर दौर को अपनी आँखों से देखा। दिल्ली का ‘पुराना लोहा पुल’ और प्रयागराज का ‘पुराना नैनी ब्रिज’—ये दोनों इंजीनियरिंग के वे बेजोड़ नमूने हैं, जो अब अपनी लंबी और शानदार सेवा के बाद रिटायर होने की कगार पर हैं।
समान विरासत, एक सा इतिहास
इन दोनों पुलों की कहानी में गजब की समानताएं हैं। दोनों का निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान यमुना नदी पर किया गया था।
निर्माण काल: प्रयागराज के नैनी पुल का निर्माण 1859 में शुरू हुआ और 1865 में यह जनता के लिए खुला। वहीं, दिल्ली का लोहा पुल 1863 में बनना शुरू होकर 1866 में तैयार हुआ।
बनावट: दोनों ही ‘डबल-डेकर’ पुल हैं, जहाँ ऊपर ट्रेनें दौड़ती हैं और नीचे सड़क मार्ग से वाहनों का आवागमन होता है।
लंबाई: दिल्ली का पुल लगभग 850 मीटर और नैनी पुल 960 मीटर लंबा है।
भाप के इंजन से बुलेट रफ्तार तक के साक्षी
इन पुलों ने भारतीय रेलवे के हर युग को जिया है। जब कोयले से चलने वाले भाप के इंजन ‘छुक-छुक’ करते हुए इन पर से गुजरते थे, तब से लेकर आज के अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक इंजनों तक, ये पुल अडिग खड़े रहे। 1978 की उस विनाशकारी बाढ़ को भी ये दोनों पुल झेल गए, जब पानी खतरे के निशान को पार कर गया था। आज भी ये पुल बाढ़ मापने के सबसे भरोसेमंद मानक माने जाते हैं।
मजबूती की मिसाल
आज के दौर में जहाँ कई आधुनिक पुल कुछ ही वर्षों में जवाब दे जाते हैं, वहीं इन 160 साल पुराने ‘लोहे के घोड़ों’ ने कभी हार नहीं मानी। विशेषज्ञों के अनुसार, ये पुल सिर्फ लोहा और ईंट नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य धरोहर (Heritage) हैं। इन्होंने पुरानी दिल्ली को पूर्वी दिल्ली से और प्रयागराज शहर को नैनी औद्योगिक क्षेत्र से जोड़कर लाखों लोगों की उम्मीदों को पंख दिए।
अब नए युग की बारी
वक्त की मांग और तकनीकी बदलाव के कारण अब इन बुजुर्ग साथियों को आराम देने की तैयारी है।
दिल्ली: पुराने लोहा पुल के समानांतर नया आधुनिक पुल तैयार हो चुका है, जिस पर जल्द ही ट्रेनों का संचालन शुरू हो जाएगा।
प्रयागराज: नैनी के पुराने पुल के बगल में 2031 के महाकुंभ से पहले एक नया रेलवे ब्रिज बनाने की मंजूरी मिल गई है। यह नया पुल चिनाब रेल ब्रिज की तर्ज पर ‘स्फेरिकल बेयरिंग तकनीक’ से बनाया जाएगा।
यादों में जिंदा रहेगी ‘खड़खड़’
भले ही आने वाले वर्षों में इन पुलों पर ट्रेनों का शोर थम जाए, लेकिन पटरियों से निकलने वाली वह खास ‘खड़खड़’ और ‘ठक-ठक’ की आवाज पीढ़ियों के जेहन में हमेशा गूँजती रहेगी। ये पुल केवल यातायात के साधन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं और यादों का हिस्सा हैं। जब ये पूरी तरह रिटायर होंगे, तो भारतीय रेलवे के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हो जाएगा।
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