चमोली (उत्तराखंड)। उच्च हिमालय के गढ़वाल मंडल में स्थित पंचकेदारों में से ‘चतुर्थ केदार’ के रूप में विश्वविख्यात भगवान रुद्रनाथ धाम के कपाट इस वर्ष 17 अक्टूबर को शीतकाल के लिए विधि-विधान के साथ बंद कर दिए जाएंगे। पंचांग गणना और धार्मिक परंपराओं के अनुसार कपाट बंदी की तिथि तय होते ही मंदिर समिति और पुजारियों ने शीतकालीन प्रवास की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
कपाट बंद होने के बाद आगामी 6 माह तक भगवान रुद्रनाथ की दैनिक पूजा, भोग और आरती उनके शीतकालीन गद्दीस्थल गोपेश्वर स्थित ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर में संपन्न की जाएगी, जहां आम श्रद्धालु शीत ऋतु में उनके सुलभ दर्शन कर सकेंगे।
17 अक्टूबर को विधि-विधान से संपन्न होगी कपाट बंदी की वैदिक परंपरा
रुद्रनाथ मंदिर के पुजारी हरीश भट्ट ने जानकारी देते हुए बताया कि ज्योतिषीय गणना और पंचांग परंपरा के अनुसार 17 अक्टूबर को ब्रह्ममुहूर्त में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक और हवन का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद भगवान रुद्रनाथ के स्वयंभू विग्रह को समाधि रूप देकर मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे।
कपाट बंद होने के पश्चात भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली स्थानीय वाद्य-यंत्रों की धुनों और शिव जयकारों के बीच अपने शीतकालीन प्रवास गोपेश्वर के लिए प्रस्थान करेगी। पुजारी हरीश भट्ट के अनुसार, इस वर्ष धाम में मौसम अनुकूल रहने से बड़ी संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं।
सगर गांव से 19 किमी का दुर्गम पैदल ट्रैक: केदारनाथ अभयारण्य का अद्भुत सफर
समुद्रतल से करीब 11,808 फीट (लगभग 3,600 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ धाम की यात्रा पंचकेदारों में सबसे कठिन और रोमांचक मानी जाती है:
- सगर गांव से शुरुआत: रुद्रनाथ पहुंचने के लिए मुख्य पैदल यात्रा चमोली के सगर गांव से प्रारंभ होती है, जहां से लगभग 19 से 21 किलोमीटर की खड़ी और पथरीली चढ़ाई तय करनी होती है।
- केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग का बफर जोन: यह पूरा यात्रा मार्ग केदारनाथ वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के संरक्षित जंगलों से गुजरता है। इस दौरान बुरांश, बांज और भोजपत्र के घने वनों के साथ-साथ दुर्लभ हिमालयी वन्यजीव और जड़ी-बूटियां देखने को मिलती हैं।
- पुंग, पनार बुग्याल और पितृधार: यात्री पुंग बुग्याल, ल्यूटी बुग्याल और विशाल पनार बुग्याल से होते हुए समुद्रतल से करीब 12,000 फीट ऊपर स्थित ‘पितृधार’ पहुंचते हैं, जहां पूर्वजों (पितरों) के तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व है।
- नंदा देवी और त्रिशूल का दीदार: मंदिर परिसर और पूरे ट्रैक से नंदा देवी, त्रिशूल, नंदा घुंघटी और कामेट जैसी विशाल बर्फीली चोटियों का 360-डिग्री विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
सितंबर में फूलों से महकेगी रुद्रनाथ घाटी, यात्रा के लिए बेहतरीन समय
पुजारी हरीश भट्ट ने तीर्थयात्रियों से अपील की है कि वे कपाट बंद होने से पूर्व अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर भगवान के दिव्य दर्शनों का पुण्य लाभ अर्जित करें।
उन्होंने बताया कि सितंबर का महीना रुद्रनाथ घाटी के लिए सबसे खूबसूरत समय होता है। इस दौरान पूरी घाटी और आसपास के मखमली अल्पाइन बुग्याल विभिन्न दुर्लभ प्रजातियों के जंगली फूलों और पवित्र ब्रह्मकमल से महक उठते हैं। यात्रा मार्ग में यात्रियों के विश्राम और भोजन के लिए स्थानीय पड़ावों (जैसे सगर, पुंग, पनार) पर टेंट, होमस्टे और सात्विक खानपान की उचित व्यवस्थाएं की गई हैं।
धार्मिक मान्यता: यहां होती है भगवान शिव के ‘एकानन’ (मुख) की पूजा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को अपने ही कुल के बंधु-बांधवों की हत्या (गोत्र हत्या) के पाप से मुक्ति पानी थी। इसके लिए वे भगवान शिव की खोज में हिमालय पहुंचे। पांडवों से बचने के लिए महादेव ने बैल (नंदी) का रूप धारण किया।
जब भीम ने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, तो शिवजी का शरीर पांच अलग-अलग हिस्सों में विभाजित होकर पांच पवित्र स्थानों पर प्रकट हुआ, जिन्हें पंचकेदार कहा जाता है:
