देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में खेती की जमीन का ग्राफ तेजी से नीचे गिर रहा है। राज्य गठन के समय जिस हरित क्रांति और कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था का सपना देखा गया था, वह अब बढ़ते शहरीकरण और पलायन की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। विधानसभा के हालिया सत्र में कृषि मंत्री गणेश जोशी द्वारा पेश किए गए राजस्व परिषद के आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि प्रदेश के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी भी हैं।
कृषि भूमि का घटता दायरा: आंकड़ों की जुबानी
विधानसभा में विधायकों के सवालों का जवाब देते हुए सरकार ने स्वीकार किया कि पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड ने अपनी 1.42 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि खो दी है।
राज्य गठन के समय: कुल कृषि भूमि 8.77 लाख हेक्टेयर थी।
वर्तमान स्थिति: यह घटकर मात्र 7.35 लाख हेक्टेयर रह गई है।
शुद्ध बोया गया क्षेत्र: जो कभी 7.70 लाख हेक्टेयर हुआ करता था, अब सिमटकर 5.27 लाख हेक्टेयर पर आ गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि परती भूमि (Fallow Land) का क्षेत्रफल 1.07 लाख से बढ़कर 2.08 लाख हेक्टेयर हो गया है। यानी खेत तो हैं, लेकिन उन पर हल नहीं चल रहा।
पहाड़ों में ‘बंजर’ होती उम्मीदें
राज्य के पहाड़ी जिलों की स्थिति सबसे अधिक विकट है। पलायन और जंगली जानवरों के आतंक के कारण खेती का रकबा लगातार कम हो रहा है:
पौड़ी गढ़वाल: यहाँ सर्वाधिक 55,320 हेक्टेयर भूमि परती (बंजर) पड़ी है।
अल्मोड़ा: यहाँ 26,447 हेक्टेयर कृषि भूमि पर खेती बंद हो चुकी है।
देहरादून: राजधानी में बढ़ते कंक्रीट के जंगलों और शहरीकरण के कारण 22,884 हेक्टेयर भूमि खेती के दायरे से बाहर हो गई है।
सरकार की रणनीति: योजनाओं के सहारे ‘महक’ की तैयारी
इस गिरते ग्राफ को थामने के लिए राज्य सरकार कई नई नीतियों पर काम कर रही है। कृषि मंत्री ने सदन को बताया कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए स्टेट मिलेट पॉलिसी (मोटा अनाज), सेब की अति सघन बागवानी, और कीवी व ड्रैगन फ्रूट जैसी नकदी फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, ‘महक क्रांति’ के जरिए सगंध पौधों की खेती को नई दिशा दी जा रही है।
जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार ने 25 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है, जिसका उपयोग राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत बाड़बंदी (Fencing) के लिए किया जाएगा।
किसानों को राहत और मनरेगा कर्मियों पर स्पष्टता
पिछले साल की अतिवृष्टि से हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने 10 हजार से अधिक किसानों को मुआवजा वितरित किया है। वहीं, सदन में एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी में ग्राम्य विकास मंत्री ने स्पष्ट किया कि मनरेगा कर्मचारियों के नियमितीकरण की फिलहाल कोई योजना नहीं है, क्योंकि यह एक केंद्र पोषित योजना है और इसके लिए कोई नई नियमावली नहीं बनाई गई है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में घटती कृषि भूमि केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर सीधा प्रहार है। यदि समय रहते प्रभावी भूमि सुधार कानून और चकबंदी जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में ‘खेती-किसानी’ केवल किताबों तक सीमित रह जाएगी।
