भुवनेश्वर: ओडिशा के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने संकल्प जताया है कि आगामी 31 मार्च 2026 तक ओडिशा पूरी तरह से नक्सलवाद के साये से मुक्त हो जाएगा। राज्य सरकार के सख्त अभियानों और प्रभावी पुनर्वास नीतियों का ही परिणाम है कि कभी बड़ी चुनौती रहे माओवादियों की संख्या अब सिमट कर मात्र 15 रह गई है।
मिशन 31 मार्च: अंतिम चरण में माओवाद का खात्मा
मुख्यमंत्री माझी ने विधानसभा में जानकारी देते हुए बताया कि राज्य अब नक्सलवाद के अंत के बेहद करीब है। वर्तमान में सक्रिय 15 माओवादी कैडर मुख्य रूप से कंधमाल, कालाहांडी और रायगड़ा जिलों के सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों तक सीमित होकर रह गए हैं। सरकार का लक्ष्य है कि मार्च के अंत तक इन अंतिम अवशेषों को भी समाप्त कर राज्य को पूर्णतः सुरक्षित घोषित किया जाए।
बदलती सुरक्षा स्थिति: जिलों का वर्गीकरण
सुरक्षा मानकों और केंद्र सरकार की सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना के अनुसार, राज्य में अब केवल कंधमाल को ही सक्रिय रूप से नक्सल प्रभावित जिला माना जा रहा है। इसके अतिरिक्त आठ अन्य जिलों—बौध, बालांगीर, कालाहांडी, कोरापुट, मलकानगिरी, नबरंगपुर, नुआपड़ा और रायगड़ा—को ‘विरासत और प्रोत्साहन’ (L&T) श्रेणी में रखा गया है, जहाँ स्थिति अब काफी हद तक नियंत्रण में है।
समर्पण और पुनर्वास: बंदूक छोड़ मुख्यधारा की ओर
ओडिशा सरकार की ‘आत्मसमर्पण और पुनर्वास’ नीति इस बदलाव की रीढ़ साबित हुई है। आंकड़ों के अनुसार:
2024 से 15 मार्च 2026 के बीच: कुल 96 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए।
पिछले पांच वर्षों में: सुरक्षा बलों ने 50 माओवादियों को ढेर किया, 78 को गिरफ्तार किया और 125 ने आत्मसमर्पण किया।
पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाले लाभ:
भटके हुए युवाओं को समाज से जोड़ने के लिए सरकार वित्तीय सहायता, पक्का आवास, मासिक वजीफा, 36 महीने का व्यावसायिक प्रशिक्षण, विवाह सहायता, और स्वास्थ्य व राशन कार्ड जैसी सुविधाएं प्रदान कर रही है।
संघर्ष और शहादत की याद
सफलता की इस राह में सुरक्षा बलों और आम नागरिकों ने बड़ी कीमत भी चुकाई है। मुख्यमंत्री ने बताया कि 2021 से अब तक नक्सली हिंसा में 15 आम नागरिकों और 5 सरकारी कर्मचारियों ने अपनी जान गंवाई है। सरकार इन बलिदानों को व्यर्थ नहीं जाने देने और राज्य में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
निष्कर्ष
ओडिशा अब विकास की एक नई सुबह की ओर बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री माझी का यह आत्मविश्वास दर्शाता है कि सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और विकास कार्यों ने नक्सली विचारधारा की जड़ों को खोखला कर दिया है। 31 मार्च की समय सीमा न केवल एक प्रशासनिक लक्ष्य है, बल्कि ओडिशा के लाखों लोगों के लिए भयमुक्त जीवन का वादा भी है।
